शोले @50: गब्बर सिंह और अनकहे किस्से

जय-वीरू की दोस्ती फिल्म शोले

फिल्म: शोले (1975)
निर्देशक: रमेश सिप्पी
लेखक: सलिम–जावेद
प्रोड्यूसर: G. P. सिप्पी

1975 में रिलीज़ हुई ‘शोले’ को आज भारतीय सिनेमा का ‘महाकाव्य’ माना जाता है। यह सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक घटना है जिसने दर्शकों के दिलों पर कब्ज़ा करने के साथ-साथ फिल्म निर्माण के तरीके को भी बदल दिया। लेकिन इस चमकदार और शानदार फिल्म का सफर उतना ही उबड़-खाबड़ और चुनौतियों भरा रहा, जितना कि उसकी कहानी में रामगढ़ की वो घाटियाँ। आइए, एक बार फिर से उसी सफर पर निकलते हैं, लेकिन इस बार उन अनकहे रास्तों से गुजरते हुए, जहाँ हर मोड़ पर एक नई कहानी, एक नया संघर्ष और एक नया जुनून छिपा है।

शोले को बनाने में आई मुख्य चुनौतियाँ: एक क्लासिक का जन्म-संघर्ष

1. फिल्म की लंबाई और एडिटिंग: कैंची की आवाज़ के पीछे का दर्द

फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद जो पहला कट तैयार हुआ, वह आज के जमाने की ब्लॉकबस्टर फिल्मों से भी लंबा, करीब 3 घंटे 20 मिनट का था। रमेश सिप्पी और उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह थी कि इतनी लंबी फिल्म दर्शकों को बाँध कर रख पाएगी या नहीं। जब इस कट को सेंसर बोर्ड और कुछ चुनिंदा दर्शकों के सामने प्रीव्यू के लिए दिखाया गया, तो प्रतिक्रिया साफ थी: फिल्म बेहतरीन है, लेकिन इसकी ‘पेसिंग’ यानी गति में सुधार की जरूरत है।

इसके बाद शुरू हुई एक दर्दनाक एडिटिंग प्रक्रिया। कई ऐसे सीन जो टीम को पसंद थे, उन्हें पूरी तरह से काटना पड़ा। इनमें कुछ ऐसे दृश्य भी शामिल थे जो ठाकुर (संजीव कुमार) के अतीत और उनके परिवार के साथ उनके रिश्ते को और गहराई से दर्शाते थे। साथ ही, कुछ डायलॉग्स को भी हटाया गया या बदला गया, क्योंकि उस जमाने में सेंसर बोर्ड की नजर में वे ‘बहुत ज्यादा’ हिंसक या विवादास्पद माने जा सकते थे। यह फिल्म के मूल स्वरूप को बचाते हुए उसे और कसावट से पेश करने की एक सूक्ष्म कला थी।

2. भौगोलिक और तकनीकी मुश्किलें: प्रकृति और टेक्नोलॉजी से जंग

रमेश सिप्पी चाहते थे कि रामगढ़ की दुनिया दर्शकों को असली लगे। इसलिए उन्होंने बैंगलोर के पास रामनगर की दुर्गम और जंगली घाटियों को चुना। आज की तरह आरामदायक वाहन और ठहरने की सुविधाएँ नहीं थीं। पूरी यूनिट को भीषण गर्मी, उड़ती धूल और पथरीले रास्तों का सामना करते हुए शूटिंग करनी पड़ी। कैमरा और भारी उपकरणों को इन ऊँची-नीची जगहों पर पहुँचाना अपने आप में एक साहसिक कार्य था।

इसके ऊपर थी तकनीकी चुनौती। शोले को भारत की पहली 70mm वाइडस्क्रीन फिल्मों में से एक बनाने का सपना देखा गया था। इस फॉर्मेट में स्टीरियो साउंड सिस्टम भी शामिल था। उस जमाने के लिए यह बहुत उन्नत तकनीक थी, जिसके बारे में ज्यादातर टेक्निशियन्स को पूरी जानकारी नहीं थी। कैमरा सेटअप से लेकर साउंड रिकॉर्डिंग तक, हर कदम पर नई मुश्किलें आती थीं। लेकिन इसी जिद और मेहनत का नतीजा था कि शोले की शानदार विजुअल और आवाज़ ने दर्शकों को थिएटर के अंदर खींच लिया।

3. कास्टिंग और कलाकारों से जुड़ी समस्याएँ: सही चेहरे की तलाश

शोले की कास्टिंग अपने आप में एक कहानी है। सबसे बड़ा संकट था गब्बर सिंह का रोल। मूल रूप से यह किरदार डैनी डेन्ज़ोंगपा को ऑफर किया गया था, जो उस समय अपने खलनायकी अभिनय के लिए मशहूर हो चुके थे। लेकिन डेट्स न मिल पाने के कारण यह संभव नहीं हो सका। इस समस्या ने टीम को एक ऐसे अभिनेता की तलाश में धकेल दिया, जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था: अमजद खान।

अमजद उस वक्त एक नए अभिनेता थे और उन पर इतने बड़े, डरावने और केंद्रीय खलनायक की भूमिका निभाने का भारी दबाव था। कहा जाता है कि प्रोड्यूसर जी.पी. सिप्पी समेत कई लोगों को इस फैसले पर संदेह था। लेकिन अमजद के ऑडिशन और उनकी डायलॉग डिलीवरी ने सबके सारे शक दूर कर दिए। बाकी इतिहास है।

4. आर्थिक दबाव: ठंडी शुरुआत और गर्म कामयाबी

उस जमाने के हिसाब से शोले एक बहुत बड़े बजट वाली फिल्म थी। इसकी लागत और प्रचार पर काफी पैसा खर्च हुआ था। जब फिल्म रिलीज़ हुई, तो पहले हफ्ते की कमाई ने किसी को भी निराश किया होता। कई सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या अपेक्षा से कम थी। टीम पर एक अदृश्य दबाव था।

लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जो आज मार्केटिंग का एक केस स्टडी बन गया है: ‘वर्ड-ऑफ-माउथ’। लोग फिल्म देखकर आए, अपने दोस्तों और परिवार को बताया, उसके डायलॉग्स दोहराए। धीरे-धीरे, एक हफ्ते के भीतर ही, थिएटरों में जबरदस्त भीड़ उमड़ने लगी। शोले ने न सिर्फ अपना खर्चा निकाला, बल्कि यह सालों तक सिनेमाघरों में चलती रही, जिसने इसे ‘अल्टीमेट ब्लॉकबस्टर’ का दर्जा दिलाया।

5. कहानी और क्लाइमेक्स को लेकर विवाद: वह अंत जो नहीं हो सका

सलिम-जावेद की मूल कहानी में फिल्म का अंत बिल्कुल अलग था। उसमें, ठाकुर अपने दोनों हाथों से गब्बर सिंह का गला दबाते हुए उसका अंत कर देता था। यह दृश्य ठाकुर के बदले की भावना को पूरी तरह से संतुष्ट करता। लेकिन सेंसर बोर्ड को यह खतरनाक लगा। उनका मानना था कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी (ठाकुर) द्वारा इस तरह का बदला लेना एक गलत संदेश देगा और समाज में हिंसा को बढ़ावा दे सकता है।

इसपर जबरदस्त बहस हुई। आखिरकार, सिप्पी और लेखकों को झुकना पड़ा और एक नया, संशोधित अंत फिल्माया गया, जिसमें वीरू और जय गब्बर को मारते हैं और ठाकुर अपने पैर से हथकड़ी लगाकर उसका प्रतीकात्मक रूप से अंत करता है। कहा जाता है कि संजीव कुमार को यह बदलाव बिल्कुल पसंद नहीं आया था, क्योंकि इसने उनके किरदार के सफर और भावनात्मक चरमोत्कर्ष को कमजोर कर दिया था।

5 अनकहे और मज़ेदार किस्से (शूटिंग के पीछे)

1. गब्बर की एंट्री का असर: सेट पर सन्नाटा

जिस दिन अमजद खान ने पहली बार गब्बर के रूप में “कितने आदमी थे?” का डायलॉग बोला, सेट पर मौजूद हर व्यक्ति स्तब्ध रह गया। उनकी आवाज़ में वह खुरदुरापन, डरावनी शांति और अधिकार का भाव था जिसकी कल्पना सलिम-जावेद ने की थी। उस एक लाइन ने ही साबित कर दिया कि गब्बर सिंह का किरदार सही हाथों में है और यह सिनेमा के इतिहास का सबसे यादगार खलनायक बनने जा रहा है।

2. धर्मेंद्र की शरारतें: 'बसंती' के लिए प्यार

धर्मेंद्र, जो वीरू की भूमिका में थे, असल जिंदगी में हेमा मालिनी (बसंती) के प्यार में पड़ चुके थे। कहा जाता है कि वह चाहते थे कि फिल्म में उनके और बसंती के रोमांटिक सीन ज्यादा हों। इसके लिए वह कैमरामैन और डायरेक्टर से री-टेक के लिए जिद करते, ताकि हेमा मालिनी के साथ उनका स्क्रीन-टाइम बढ़ सके। यह शरारत पूरी यूनिट के लिए मजेदार अनुभव बन गई।

3. हारमोनिका — जय की पहचान: एक छोटा सा नोट, एक बड़ी पहचान

जय (अमिताभ बच्चन) का हारमोनिका बजाना फिल्म का एक अविस्मरणीय प्रतीक बन गया। यह विचार सलिम-जावेद का था। उन्हें लगा कि जय के चुप-चुप और रहस्यमयी व्यक्तित्व को किसी ऐसी चीज की जरूरत है जो उसकी भावनाओं को बिना शब्दों के व्यक्त कर सके। हारमोनिका की सुरीली और उदास धुन ने न सिर्फ जय के दर्द को दिखाया, बल्कि यह उसकी पहचान और ठाकुर के बीच का कनेक्शन भी बनी।

4. ठाकुर का बदला: संजीव कुमार की नाराजगी

जैसा कि पहले बताया गया, मूल अंत बदलने पर संजीव कुमार काफी नाराज और निराश हुए थे। एक अभिनेता के तौर पर वह पूरी तरह से ठाकुर के दर्द और बदले की आग में जल रहे थे। उन्होंने इस भूमिका को निभाने के लिए खुद को पूरी तरह झोंक दिया था। जब उन्हें पता चला कि क्लाइमेक्स में उनके किरदार को वह संतुष्टि नहीं मिलेगी जिसकी वह हकदार थी, तो यह उनके लिए एक कलात्मक समझौता जैसा था। हालाँकि, उनके अभिनय की ताकत ने ठाकुर का दर्द इतना गहरा बना दिया कि आज भी दर्शक उस अधूरे बदले को महसूस कर पाते हैं।

5. शोले की धीमी शुरुआत: मुंहजबानी विज्ञापन का चमत्कार

फिल्म के पहले हफ्ते के औसत रिस्पॉन्स के पीछे एक कारण यह भी था कि दर्शकों को इतनी लंबी और गंभीर ‘कर्वी’ फिल्म की आदत नहीं थी। लेकिन जैसे-जैसे लोगों ने फिल्म देखी, उसके डायलॉग्स, उसके किरदार चर्चा का विषय बनने लगे। “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर”, “जो डर गया सो मर गया” जैसे डायलॉग्स हर जुबान पर चढ़ गए। यह ‘वर्ड-ऑफ-माउथ’ का एक ऐसा शक्तिशाली उदाहरण बना, जिसने फिल्म को एक ‘फिनोमेनन’ में बदल दिया और यह पांच साल तक किसी न किसी सिनेमाघर में चलती रही।

गब्बर सिंह (अमजद खान) — 5 दिलचस्प किस्से

1. रोल मिलने की जद्दोजहद: डैनी से अमजद तक का सफर

जब डैनी डेन्ज़ोंगपा उपलब्ध नहीं हुए, तो निर्माताओं की नजर किशोर कुमार के भाई अशोक कुमार पर पड़ी, लेकिन वह भी नहीं हो पाए। तब सलिम खान ने अमजद खान का नाम सुझाया, जो उस समय बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम कर रहे थे। अमजद ने जब स्क्रिप्ट पढ़ी और गब्बर के डायलॉग्स को अपने अंदाज में बोला, तो रमेश सिप्पी की सारी शंकाएँ दूर हो गईं। उन्हें लगा कि यही वह ‘आवाज’ और ‘लुक’ है जिसकी उन्हें तलाश थी।

2. आवाज पर पहला शक: जो कमजोरी बनी ताकत

अमजद की आवाज़ सामान्य ‘खलनायकी’ आवाज़ से अलग थी। यह खुरदुरी, थोड़ी सुस्त और अजीबोगरीब थी। शुरुआत में कुछ लोगों को डर था कि कहीं यह आवाज़ दर्शकों को हंसाई न लगे। लेकिन अमजद की डिलीवरी ने इस आवाज़ को एक डरावनी शक्ति दे दी। गब्बर की आवाज़ उसके पागलपन और अप्रत्याशित स्वभाव का सबसे बड़ा प्रमाण बन गई।

3. डायलॉग्स का जनून: लोकभाषा की जादूगरी

सलिम-जावेद ने गब्बर के डायलॉग्स को लिखने के लिए असली डकैतों की कहानियों और उनके इलाके की बोली (लोकभाषा) का गहन अध्ययन किया था। “कितने आदमी थे?”, “जो डर गया सो मर गया”, “अब तेरा क्या होगा कालिया?” जैसे डायलॉग्स सीधे जन-मानस की भाषा से निकले थे, इसीलिए वे इतने प्रभावशाली और यादगार बने। अमजद ने इन्हें बोलते वक्त एक खास तरह का ‘पागलपन’ और ‘छिछोरापन’ भर दिया, जो गब्बर की पहचान बन गया।

4. सीट पर असली डर: एक्टर का हुनर या किरदार की सच्चाई?

गब्बर के सीन शूट होते वक्त एक दिलचस्प घटना घटती थी। जो एक्स्ट्रा आर्टिस्ट्स और जूनियर कलाकार सेट पर मौजूद होते थे, वे अमजद खान को गब्बर के कपड़ों और मेकअप में देखकर सचमुच डर जाते थे। उनकी आँखों में छिपा पागलपन इतना वास्तविक था कि लोगों को लगता था मानो सामने कोई सच्चा डकैत खड़ा हो। यह अमजद के अभिनय की सर्वोच्च जीत थी।

5. लुक और गेटअप की असलियत: चंबल की छाप

गब्बर सिंह का लुक किसी काल्पनिक विलेन जैसा नहीं, बल्कि उस जमाने के चंबल के असली डकैतों जैसा था। उसके बिखरे बाल, मैली-कुचैली धोती, बिना बनावट के कपड़े और जूते-चप्पल न पहनने का अंदाज सब कुछ वास्तविकता से उठाया गया था। अमजद खान ने इस लुक को और भी प्रामाणिक बनाने के लिए अपने चेहरे के भावों और शरीर की भाषा पर खूब मेहनत की। यही वजह है कि गब्बर सिंह सिर्फ एक ‘विलेन’ नहीं, बल्कि एक ‘छवि’ बन गया।

निष्कर्ष — कठिनाइयाँ थीं, पर कला और मेहनत ने जीत हासिल की

शोले का सफर हमें सिखाता है कि महान कलाकृति की राह कभी आसान नहीं होती। हर कदम पर संदेह, आर्थिक दबाव, तकनीकी अड़चनें और रचनात्मक समझौतों का सामना करना पड़ा। लेकिन रमेश सिप्पी के नेतृत्व में पूरी टीम का जुनून, सलिम-जावेद की लेखनी की ताकत, और कलाकारों के अद्वितीय अभिनय ने मिलकर एक ऐसी फिल्म बनाई जो समय के साथ-साथ और भी ज्यादा चमकती गई।

गब्बर सिंह का डरावना करिश्मा, वीरू और जय की निस्वार्थ दोस्ती, बसंती की जीवटता, और ठाकुर के सन्नाटे में छिपे दर्द ने मिलकर न सिर्फ एक शानदार कहानी कही, बल्कि भारतीय सिनेमा की भाषा ही बदल दी। शोले सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक ‘फीलिंग’ है, एक ‘एहसास’ है जो आज भी करोड़ों दिलों में जिंदा है।

पाठकों के लिए सवाल (नीचे कमेंट में जरूर बताएं!)

  1. आपका सबसे पसंदीदा शोले का सीन कौन-सा है — और क्यों? क्या वह सीन है जहाँ ठाकुर गब्बर को पहली बार अपने सामने पाते हैं, या वह सीन जहाँ वीरू और बसंती की मुलाकात होती है, या फिर वह कॉमेडी सीन जहाँ सांभा और कालिया सोने का इंतज़ार कर रहे होते हैं?
  2. क्या आपको लगता है कि अगर गब्बर का रोल किसी और (जैसे डैनी डेन्ज़ोंगपा) ने निभाया होता तो फिल्म उतनी ही सफल होती? क्या अमजद खान के गब्बर की जगह कोई और भर पाता?
  3. आप किस किरदार से सबसे ज्यादा जुड़ते हैं — जय, वीरू, ठाकुर या गब्बर? और सबसे महत्वपूर्ण बात, क्यों? क्या उस किरदार की कोई खास आदत, कोई डायलॉग या कोई संघर्ष आपको खास लगता है?

अगला पोस्ट आने वाला है..

अगली पोस्ट में मैं लेकर आऊँगा: “शोले: सांभा और कालिया के पर्दे के पीछे के किस्से — अनकहे सच” — जिसमें उन सीन-शिविरों और कलाकारों की छोटी-छोटी कहानियों का ज़िक्र होगा जो आपने शायद पहले नहीं सुनी होंगी। जैसे कि जय और वीरू की जोड़ी को लेकर क्या कोई मुश्किलें आईं? सांभा के किरदार के पीछे की कहानी क्या है?

आप बताइए, अगले पोस्ट के लिए आप कौन-सा टॉपिक सबसे ज्यादा पढ़ना चाहेंगे?

  • सलिम-जावेद की डायलॉग राइटिंग प्रक्रिया
  • एक्टर्स और डायरेक्टर के बीच की जद्दोजहद की कहानियाँ
  • शोले की मार्केटिंग और प्रचार की रणनीतियाँ
  • फिल्म के संगीत और गानों का असर

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